एक बार शाह अकबर के दरबार भरा हुआ था और दरबार का कामकाज चल रहा था. उतने में शहर का एक नामी तेल का व्यापारी दरबार में अपनी शिकायत लेकर आया उसके साथ एक कसाई भी था.
व्यापारी ने शाह अकबर को अपनी शिकायत बताते हुए कहा, " जहाँपनाह, शहर में मेरी तेल की दुकान है और आज मैं अपनी दुकान पर बैठकर व्यापार कर रहा था तब यह कसाई मेरी दुकान पर तेल खरीदने के लिए आया और तेल खरीद कर चलाया गया. बाद में जब मैंने देखा तो मेरी पैसो से भरी थैली दुकान से गायब थी. चूँकि मेरी दुकान पर आखरी ग्राहक ये कसाई ही था इसलिए मुझे इस पर संदेह गया की उसने मेरी पैसो की थैली चुराई होगी. इसलिए मैं जब उसके घर पहुंचा तो उसके हाथ में मेरी वो ही पैसो की थैली देखी जो दुकान से गायब हुई थी. लेकिन अब जब मैं इस कसाई से अपनी पैसो की थैली वापस मांग रहा हूँ तो ये देने से इंकार कर रहा है "
तेल के व्यापारी ने अपना पक्ष रख दिया तो शाह अकबर ने कसाई की तरफ देखा. कसाई ने भी शाह अकबर को अपनी बात बताते हुए कहा, " जहाँपनाह, ये सच है की मैं इस तेल के व्यापारी की दुकान पर तेल खरीदने के लिए गया था लेकिन मैंने उसकी थैली नहीं चुराई है बल्कि ये थैली मेरी खुद की ही है और इसमें रखे हुए पैसे भी मेरे है "
शाह अकबर दोनों की बात सुनकर विचार में पड गए. क्योंकि दोनों की बातों पर विश्वास किया जाए तो भी सही चोर को पकड़ना बहोत मुश्किल था. ऐसे में अकबर ने इस मामले में बीरबल को हस्तक्षेप करने को कहा.
बीरबल ने पैसो की थैली अपने पास रख ली और कसाई तथा तेल के व्यापारी दोनों को एक दिन बाद दरबार में आने के लिए कहा.
उन दोनों के जाने के बाद बीरबल ने थैली से पैसे निकाले और सूंघने लगे. सूंघने के बाद सभी पैसे फिर से थैली में रख दिए. अगले दिन जब फिर से दोनों शख्स दरबार में आए तो बीरबल ने शाह अकबर के की हाजरी में सही चोर की पहचान बताते हुए कहा, " जहाँपनाह, थैली और थैली में रखे हुए पैसे असल में कसाई के है और यह तेल का व्यापारी का दावा झूठा है. मैंने थैली में रखे हुए पैसो को सुंघा तो उसमे से कुछ गंध सी आ रही थी जैसी की इस कसाई के कपड़ो से आ रही है. लिहाजा अगर ये पैसे तेल के व्यापारी के होते तो उसमे से तेल की गंध जरूर आती. "
तेल का व्यापारी अपनी भूल पकड़े जाने पर झटपटाने और चिल्लाने लगा तो बीरबल ने सिपाहीओं को आदेश दिया की इसे कैद कर लिया जाए.

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