शाह अकबर के दरबार में यूँ तो सभी दरबारी मिलजुल कर रहते थे लेकिन कुछ दरबारी ऐसे भी थे जिसको शाह के दरबार में बीरबल का ऊँचा स्थान हजम नहीं होता था. लेकिन बीरबल की हाजरी में वो शाह अकबर से उसकी शिकायत नहीं कर पाते थे और मन ही मन इर्षा से जल रहे थे.
ऐसे में एक मौका ऐसा आया की बीरबल पांच दिनों के लिए दूसरे राज्य में अपने किसी संबंधी के घर गए और शाह अकबर के दरबार में पांच दिन के लिए बीरबल की मौजूदगी नहीं थी. इसका लाभ बीरबल के ईर्षालु दरबारी ने उठाना चाहा और उन्होंने शाह अकबर के कान भरना शुरू कर दिया.
चार ईर्षालु दरबारियों की एक टोली ने शाह अकबर से कहा, " जहाँपनाह, आपने खांमखा बीरबल को सर पे चढ़ा रखा है और इससे वो घमंडी होते जा रहे है. हांलाकि जो काम बीरबल करते है वो हम चारों को भी आता है. "
शाह अकबर ने उन्हें जवाब दिया, " क्या वाकई ?, अगर तुम्हारा दावा सच्चा है तो मैं तुम चारों से एक सवाल करता हूँ, अगर तुम सही जवाब नहीं दे पाए तो मैं तुम चारों को फांसी पर चढ़ा दूंगा "
चारों ने हामी भरी और शाह अकबर ने उनसे सवाल पूछा के " दुनिया की सबसे बड़ी चीज कौन सी है ? "
चारों दरबारियों ने शाह अकबर से जवाब के लिए एक हफ्ते का समय माँगा. शाह अकबर ने उसे एक सप्ताह का वक्त दीया और कहा की आठवें दिन जवाब नहीं मिला तो फांसी के लिए तैयार रहना.
पांच दिन गुजरने तक चारों में से किसी को भी सवाल का जवाब नहीं मिल पाया. वहीँ बीरबल भी अपने संबंधी के घर से अपने शहर वापीस आ चुके थे. अंत में चारों ने बीरबल की मदद मांगने का फैसला किया. और बीरबल को मिलकर सारी बात कही.
बीरबल ने उनसे कहा की वो उन चारों को फांसी से बचा लेगा बशर्ते वो उसकी शर्त मानें. चारों शर्त मानने के लिए तैयार हो गए. और शर्त के मुताबिक चारों ने एक चारपाई पर बीरबल को बिठाया और उसको अपने कंधो पर उठाया. साथ ही एक दरबारी ने हाथ में बीरबल के जूते उठाए. और इसी चारपाई के साथ शाह अकबर के दरबार में पेश हुए.
वहां पहुंचकर बीरबल ने शाह अकबर से कहा, " जहाँपनाह, दुनिया में सबसे बड़ी चीज गरज है, अगर गरज है तो लोग न करने का काम करने के लिए भी मजबूर हो जाते है. ये चारों की गरज ही है जो मुझे यहाँ इस तरह लाए है. आपसे निवेदन है की इन चारों को फांसी न दी जाए और माफ़ कर दिया जाए. "
शाह अकबर ने बीरबल का मान रखते हुए चारों दरबारी को माफ़ किया और आगे ऐसी गुस्ताखी न करने की नसीहत दी.

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